धर्म या विज्ञान
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क्या आपने कभी सोचा भी होगा कि पूरी दुनिया में विज्ञान का विरोध शुरु हो जाएगा । लेकिन ऐसा हो रहा है । लोग कहते हैं कि साइंस पूरी दुनिया में एक जैसा होता है । लेकिन हमारा मानना है कि नहीं विज्ञान पूरी दुनिया में एक जैसा नहीं होता । यूरोपीयन साइंस भारत विज्ञान से एकदम भिन्न है । हमारा विज्ञान माँस, अण्डे, मछली खाने को प्रेरित नहीं करता, किन्तु यूरोपीयन साइंस मांस , मछली, अण्डे आदि पर ही निर्भर है , जबकि हमारा विज्ञान वनस्पति पर आधारित है । हमारा विज्ञान धर्म का विरोध कभी नहीं करता, किन्तु यूरोपियन विज्ञान धर्म के विपरीत दिशा में चलता है । हमारा विज्ञान शील, चरित्र को बहुत महत्त्व देता है, किन्तु यूरोपीयन साइंस शील, चरित्र से कोई मतलब नहीं । इसीलिए आज पूरी दुनिया में विज्ञान का विरोध हो रहा है । यह विरोध कई मायनों में यूरोपियनिज्म का विरोध है । आगे देखना पूरी दुनिया से कुछ सौ वर्षों में यूरोपियन विज्ञान खत्म हो जाएगा । भारत में , पाकिस्तान में इसका बहुत विरोध हो रहा है ।
कुछ समय पूर्व श्रीमान् राजीव दीक्षित जी ने इस पर कई व्याख्यान दिए । आज पूरी दुनिया में पश्चिमीय साइंस का विरोध हो रहा है । हमने आज इस पर विश्लेषण किया है, आप इसे पढें----
क्या भारत में पनप रही है साइंस विरोधी भावना ???
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दुनिया में विज्ञान विरोधी नजरिये की घुसपैठ ने बुद्धिवादियों, वैज्ञानिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को चिंता में डाल दिया है. और तो और अर्थशास्त्री, उद्योगपति और अर्थनीति के जानकार भी इस रवैये से खासे परेशान नजर आते हैं ।
ऐसा नहीं है कि पिछड़े हुए या विकासशील देश ही इस रवैये की चपेट में हैं, जहां विज्ञान और अर्थव्यवस्था की तरक्की की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी हैं. वैज्ञानिक सोच के विरोधी समूह अमेरिका, रूस, चीन, जापान जैसे विकसित देशों में भी सक्रिय हो चुके हैं ।
२०१४-१५ के सालों में भारत में भी विज्ञान और प्रति-विज्ञान को लेकर टकराव नये सिरे से उभर आए थे. आक्रामक तरीके से ये विचार सामने लाने की कोशिश भी खूब हुई कि "प्राचीन” भारत ज्यादा वैज्ञानिक और ज्यादा प्रौद्योगिकी विचार संपन्न था. जबकि आधुनिकता में प्राचीनता का कभी विरोध होता ही नहीं है, रूढ़ियों का होता है । २०१५ में भारतीय विज्ञान कांग्रेस के मुंबई अधिवेशन में प्राचीन भारत के "आविष्कार” के बारे में विस्तार से चर्चा की गई ।
इस विज्ञान सम्मेलन में "आविष्कारों” में अंग प्रत्यारोपण से लेकर विमान तक की चर्चा की गई । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इसमें शिरकत की थी और गणेश का उदाहरण देकर उन्होंने एक तरह से विज्ञान और तर्क के समांतर चल रही एक अवैज्ञानिक और विज्ञान विरोधी धारा को ही पुष्ट किया था । इससे कुछ समय पहले महाराष्ट्र में ही पाखण्डी, पश्चिमपरस्त, हिन्दूविरोधी, इस्लाम और ईसाई समर्थक नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या कर दी गई थी ।
पड़ोसी पाकिस्तान में भी कम बुरे हाल नहीं, जहां बददिमागी और अतार्किकता का एक अदृश्य बाजार पनप रहा है. अमेरिका में भी वैज्ञानिक समुदाय इस बात से चिंतित है कि कई लोग अपने बच्चों को टीका लगवाने ही नहीं दे रहे हैं, उनकी दलील है कि टीकाकरण उनके बच्चों में नई बीमारी भर देगा. भूतप्रेत से लेकर "ईश्वरीय शाप” के झांसे में आए लोग अब जलवायु परिवर्तन की मान्य और प्रमाणित अवधारणा को ही सिरे से खारिज करने पर तुले हैं. विज्ञान और तर्क विरोधी रवैये से औद्योगिक विकास का भी पहिया रुक जाने का खतरा पैदा हो गया है. क्योंकि अगर नए आविष्कार नहीं होंगे तो आखिरकार कमाई भी नहीं होगी. विकास और समृद्धि आजकल नई खोजों और बाजार में उनकी खपत पर ही निर्भर है. अगर विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नई खोजें, नये अध्ययन, और नये प्रयोग नहीं होंगे तो लोग तो जहां के तहां ही थमे रह जाएंगे. स्कूलों से लेकर विश्वविद्यालयों तक की पूरी शिक्षा चरमरा जाएगी. जीवन में उपयोगी ज्ञान की भारी किल्लत हो जाएगी और अर्थव्यवस्था एक शून्य में स्थिर हो जाएगी ।
वूडू: जादू टोने की रहस्यमयी दुनिया समुद्र तट पर
पश्चिम अफ्रीकी देश बेनिन का कुइदाह शहर वूडू पूजा का केंद्र है. यहां हर साल वूडू फेस्टिवल होता है. कुछ स्थानीय समुदायों के लिए यह साल का सबसे अहम त्योहार है ।
यही सब सरोकार उन तीन नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिकों के जेहन में थे जो पिछले दिनों भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय और स्वीडन की नोबेल मीडिया संस्था के साझे कार्यक्रम में शिरकत करने दिल्ली आए थे. विलियम ई मोएर्नर (रसायनशास्त्र 2014), हेराल्ड वारमस (चिकित्सा 1989) और सर्ज आरोश (भौतिकी 2012) ने एंटी-साइंस प्रवृत्ति के प्रति आगाह किया. आशय ये था कि इस "लोकप्रियतावाद” के चक्कर में हम पीढ़ियों और शताब्दियों की मेहनत से हासिल वैज्ञानिक जमीन और वैज्ञानिक जमीर को गंवा न बैठे. ये तीनों वैज्ञानिक संयोगवश गुजरात में होने वाले वाइब्रेंट गुजरात सम्मिट में भी मौजूद थे. विदेशी और देशी निवेशकों को खींचने के लिए इस विराट आयोजन की शुरुआत मोदी के मुख्यमंत्री काल में हुई थी ।
गुजरात के सरकारी स्कूलों में मीडिया खबरों के मुताबिक ‘तेजोमय भारत' नाम की किताब पढ़ाने को कहा गया जिसमें बताया गया था कि स्टेम सेल की खोज को कौरवों की पैदाइश से हुई है । टीवी का श्रेय भी योगविद्या और दिव्यदृष्टि को हासिल है । यह शुरुआत है । आगे भी भारत यूरोपीय साइंस से विपरीत ऐसा ही होगा ।

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